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How To pray For making Wishes Complet

Tip 1: Pray Simply

We might think we have to pray passionate, persuasive words for God to hear us, but in reality He listens even to our shortest “SOS” prayers. 
“The fewer the words, the better the prayer,” said Martin Luther. Isn’t that reassuring? We can talk to God in everyday language, just like we talk to a friend. We don’t have to pray long. God delights in a simple word of praise, like “Lord, I love you.” He treasures the anguished prayer of a mother when she calls, “Heal my child.”He answers the simplest request: “Lord, give me strength for today.” 

Tip 2: Read the Word

Have you ever had a one-sided conversation with someone who talked continually without listening to you? The conversation didn’t go very far, did it? We do the same thing to God when we pray without reading the Bible, His eternal letter of love and wisdom to each one of us on earth. Reading Scripture helps us get to know God. It brings life to our prayers.  
If you want to have a more effective conversation with God, read Scripture. Let David’s words in the Psalms enliven your prayers. Stop in the Gospels to pray over a verse that strikes you, asking God to work that truth into your heart. Let the words of Paul’s letters give you specific prayer requests for yourself and the people you love. 

Tip 3: Make Prayer Active and Multi-Sensory 

Prayer grows dull when we turn it into a purely mental exercise. God made us creative beings, so why don’t we bring creativity to our prayer lives? Lighting a fragrant candle can send a signal to our brains: “It’s time to pray.” It can bring a sacred sense of awe to a few minutes of prayer. Listening to music can help us focus on God. Many people enjoy doodling, drawing, or painting while they pray.
I help my ADHD-plagued brain focus on prayer by keeping a prayer journal. Making a list of requests keeps my mind alert; I stop to pray for each petition after jotting it down. Occasionally I write out longer prayers like a letter. A prayer journal buildsfaith when you look back over your petitions and recall God’s answers.
Remember you don’t have to sit quietly to pray. My best prayer times happen out on the walking trail. Praying aloud also helps me keep my mind engaged, but I save that for prayer times at home.

Tip 4: Make Prayer an Integral Part of Your Day

This verse baffles me: “Rejoice always, pray without ceasing, give thanks in all circumstances;” Is it really possible to pray without ceasing? 
How about trying an experiment? Start and end your day with prayer. Lift up short prayers to God as often as you can throughout your day. Pray over your schedule. Ask God to help you with your to-do list. When you hear a troubling news report, lift the situation up to God. Say a prayer for your spouse or child as you give him or her a hug. Pray for the person you’re talking to. A friend of mine gives thanks whenever she stops at red lights while driving. Look for prayer moments that work for your life.

Tip 5: Pray Expectantly

Prayer becomes a lifeless exercise when we’re not looking for answers. Jesus invites us to expect God to work. “Ask, and it will be given to you; seek, and you will find; knock, and it will be opened to you." 
How much more exciting prayer becomes when we keep our eyes open to watch for God’s answers. Sometimes I wonder how many answers we miss because we don’t really expect God to respond.
Remember  “Devote Yourselves to Prayer, being watchful and thankful.” 
How about getting started today? Don’t get discouraged if you get distracted like I do. Just get back on track. Pray and watch for God’s answers, so you can thank Him. He might answer differently than you expect, but His answer will always be better than what you had in mind.

क्या परमेश्वर हमारी प्रार्थना का उत्तर देता है?

आपको प्रार्थना कैसे करनी चाहिए? प्रार्थना का उत्तर देने के लिए परमेश्वर को क्या करना पड़ता है?

क्या आप किसी को जानते हैं जो सचमुच परमेश्वर पर विश्वास करता है? जब मैं एक नास्तिक था, मेरी एक अच्छी मित्र थी जो अक्सर प्रार्थना किया करती थी। वह हर सप्ताह मुझे किसी के बारे में बताती थी जो उसने परमेश्वर पर विश्वास करके उन्हें उसका ध्यान रखने को कहा था। हर सप्ताह मैं देखता था परमेश्वर ने उसकी प्रार्थना का उत्तर देने के लिए कुछ असामान्य किया था क्या आप जानते हैं कि एक नास्तिक के लिए यह निरीक्षण करना कितना कठिन था। एक सप्ताह, फिर दूसरा सप्ताह, कुछ समय के बाद यह अनुरूपता बहुत कमजोर तर्क की तरह लगनेलगी।
ईश्वर ने मेरी मित्र की प्रार्थना का उत्तर क्यों दिया? उसका सबसे बड़ा कारण यह है कि उसका ईश्वर से एक ऱिश्ता था। वह ईश्वर का अनुसरण करना चाहती थी। वास्तव में उसने वह सुना जो वह कह रहे थे। उसके दिमाग में था कि ईश्वर को यह हक है कि वे जीवन में उसे निर्देश दें। जब ईश्वर ने ऐसा किया तब उसने उसका स्वागत किया। जब वह किसी भी चीज के लिए प्रार्थना करती थी तो वह ईश्वर के रिश्ते का एक स्वाभाविक हिस्सा थी। अपनी जरूरतों, अपनी चिन्ताओं और उसके जीवन का जो प्रमुख मुद्दा था, उसके लिए ईश्वर के पास आने में उसे बहुत सहजता महसूस होती थी। इसके अलावा उसने जो कुछ भी बाइबल में पढ़ा था, वह उससे आश्वस्त थी कि ईश्वर चाहता है कि वह उसपर उसी तरह विश्वास करे। उसने वही प्रदर्शित किया जो बाइबल का यह वक्तव्य कहता है, “और हमें उसके सामने जो हियाव होता है, वह यह है; कि यदि हम उस की इच्छा के अनुसार कुछ मांगते हैं, तो हमारी सुनता है।”1 “ क्योंकि प्रभु की आंखे धमिर्यों पर लगी रहती हैं, और उसके कान उन की बिनती की ओर लगे रहते हैं, परन्तु प्रभु बुराई करने वालों के विमुख रहता है॥”2

ईश्वर सभी की प्रार्थनाओं का उत्तर क्यों नहीं देता है?

वह इसलिए,क्योंकि शायद उनका ईश्वर से ऱिश्ता नहीं है। उन्हें शायद पता है कि ईश्वर का अस्तित्व है और वे समय- समय पर ईश्वर की पूजा भी करते हैं,पर उनकी प्रार्थना का उत्तर नहीं मिलता क्योंकि शायद उनका ईश्वर से ऱिश्ता नहीं है। यह भी हो सकता है कि उन्हें ईश्वर से उनके पापों के लिए पूरी क्षमा नहीं मिली हो। आप पूछेँगे उनसे आपका क्या लेना देना है? यहाँ उसकी व्याख्या दी गई है। “सुनो, यहोवा का हाथ ऐसा छोटा नहीं हो गया कि उद्धार न कर सके, न वह ऐसा बहरा हो गया है कि सुन न सके;”“ परन्तु तुम्हारे अधर्म के कामों ने तुम को तुम्हारे परमेश्वर से अलग कर दिया है, और तुम्हारे पापों के कारण उस का मुँह तुम से ऐसा छिपा है कि वह नहीं सुनता।”3
ईश्वर से इस अलगाव को महसूस करना बिल्कुल स्वाभाविक है। जब लोग ईश्वर से कुछ माँगते हैं तब ज्यादातर क्या होता है? वे शुरू करते हैं—“ईश्वर मुझे इस समस्या के लिए सच में आपकी जरूरत है। ------ “और उसके बाद आप रुक जाते हैं, फिर से शुरू करते हैं ----“ मैंने यह महसूस किया है कि मैं एक पूर्ण मनुष्य नहीं हूँ, मुझे मदद माँगने का कोई हक नहीं है ---- ” यहाँ अपने द्वारा किए गए पाप और असफलता की एक जागरूकता है। प्रार्थना करनेवाला मनुष्य जानता है कि यह केवल उसे ही नहीं; बल्कि ईश्वर को भी पता है। यहाँ एक भावना है, “ मैं किससे मजाक कर रहा हूँ?” उन्हें शायद यह नहीं पता है कि वे किस तरह अपने सभी पापों के लिए ईश्वर से क्षमा पा सकते हैं। उन्हे शायद यह भी नहीं पता है कि किस तरह ईश्वर से ऱिश्ता बना सकते हैं ताकि ईश्वर उनकी बात सुन सके। ईश्वर आपकी प्रार्थना कबूल करे उसका यह आधार है।

कैसे प्रार्थना करें: बुनियाद या आधार

सबसे पहले आप ईश्वर से एक ऱिश्ता बनाइए। देखिए क्यों? कल्पना कीजिए,माइक नामका एक आदमी प्रिंसटन विश्वविद्यालय के अध्यक्ष से उसके लिए एक गाड़ी के ऋण के लिए सहहस्ताक्षर करने को कहे। अगर माइक व्यक्तिगत रूप से प्रिंसटन विश्वविद्यालय के अध्यक्ष को नहीं जानता है तो गाड़ी के लिए ऋण नहीं मिलेगा। यदि अध्यक्ष की बेटी अपने पिता से गाड़ी के ऋण के लिए सहहस्ताक्षर करने को कहे तो कोई समस्या नहीं होगी। रिश्ता मायने रखता है।
ईश्वर के साथ, जब व्यक्ति असल में ईश्वर की संतान हो, जब व्यक्ति ईश्वर का हो तब ईश्वर उन्हें जानता है और उनकी प्रार्थना सुनता है। यीशु ने कहा, “अच्छा चरवाहा मैं हूं; जिस तरह पिता मुझे जानता है, और मैं पिता को जानता हूं।” “मेरी भेड़ें मेरा शब्द सुनती हैं, और मैं उन्हें जानता हूं, और वे मेरे पीछे पीछे चलती हैं।”
“और मैं उन्हें अनन्त जीवन देता हूं, और वे कभी नाश न होंगी, और कोई उन्हें मेरे हाथ से छीन न लेगा।“4 जब यह ईश्वर पर आता है तब,क्या सच में आप उसे जानते हैं या वह आपको जानता है? क्या आपका ईश्वर से एक ऱिश्ता है, जो परमेश्वर को आपकी प्रार्थना सुनने के लिए बाध्य करे या वह ईश्वर आपसे बहुत दूर है, या आपके जीवन में केवल एक धारणा की तरह है। अगर ईश्वर आपसे बहुत दूर है या आपको यकीन नहीं है कि आप ईश्वर को जानते हैं,यहाँ देखिए कैसे आप ईश्वर से इसी क्षण से एक रिश्ता शुरू कर सकते हैं 

क्या ईश्वर आपकी प्रार्थना जरूर सुनेगा ?

वे जो उसे जानते हैं और उसपर विश्वास करते हैं। ऐसा लगता है यीशु अपने प्रस्ताव में बहुत उदार हैं, “यदि तुम मुझ में बने रहो, और मेरी बातें तुम में बनी रहें तो जो चाहो मांगो और वह तुम्हारे लिये हो जाएगा।”5 “उनमें रहना” और उनके शब्दों का “आपलोगों में रहना” का तात्पर्य है कि वे लोग अपना जीवन ईश्वर की जागरूकता में, उसपर विश्वास करके, उसकी बात सुनकर, जो वह कहता है, बिताते हैं। उसके बाद वे जो चाहते हैं उससे पूछ सकते हैं। यहाँ पर दूसरा योग्यता प्राप्त व्याख्यान है “और हमें उसके सामने जो हियाव होता है, वह यह है ; कि यदि हम उस की इच्छा के अनुसार कुछ मांगते हैं, तो हमारी सुनता है।“ “और जब हम जानते हैं, कि जो कुछ हम मांगते हैं वह हमारी सुनता है, तो यह भी जानते हैं, कि जो कुछ हम ने उस से मांगा, वह पाया है।“6 ईश्वर हमारी प्रार्थनाओं को अपनी इच्छा से ( और अपने ज्ञान के अनुसार, हमारे लिए उनका प्रेम, उनकी पवित्रता के अनुसार) कबूल करते हैं।
हम अगर यह मानें कि हम, ईश्वर की इच्छा जानते हैं तो हम कहाँ पहुँचॆगें, क्योंकि एक खास चीज हमारी समझ में आती है। हम मानते हैं कि विशिष्ट प्रार्थना का एक ही सही उत्तर है, जब हम यह मानेंगे कि यह ईश्वर की इच्छा है। यहीं पर यह कठिन हो जाता है। हमलोग समय और ज्ञान की सीमा में रहते हैं। हमारे पास एक परिस्थिति की सीमित जानकारी होती है। उस परिस्थिति पर हम भविष्य की कार्यवाही लागू करते हैं। ईश्वर की समझ असीमित है। जीवनकाल या इतिहास में कोई घटना कैसे घटित होगी इसकी जानकारी केवल उसे है। उसका कोई दूरस्थ उद्देश्य होगा जो हमारी समझ से परे है। अतः ईश्वर कुछ भी ऐसे ही नहीं करेगा क्योंकि यह निश्चित है कि यही ईश्वर की इच्छा है।

वह क्या लेता है? ईश्वर क्या करने को प्रवृत्त है?

हमारे प्रति ईश्वर की भावनाओं को जानने में कई पृष्ठ भरे जा सकते हैं। पूरी बाइबल ही इसका विवरण है कि ईश्वर हमें अपने साथ किस तरह के रिश्ते की अनुभूति करवाना चाहता है और किस तरह का जीवन प्रदान करना चाहता है? यहाँ पर कुछ उदाहरण दिए जा रहे हैं,“तो भी यहोवा इसलिये विलम्ब करता है कि तुम पर अनुग्रह करे, और इसलिये ऊंचे उठेगा कि तुम पर दया करे। क्योंकि यहोवा न्यायी परमेश्वर है; क्या ही धन्य हैं वे जो उस पर आशा लगाए रहते हैं॥“7 क्या आपने इसे समझा जैसे कोई अपनी कुर्सी से खड़ा हो रहा है ताकि वह आकर आपकी मदद कर सके। वह कृपा दिखाने के लिए खड़ा हो रहा है। “ईश्वर का मार्ग सच्चाई; यहोवा का वचन ताया हुआ है; वह अपने सब शरणागतों की ढाल है॥“8 “यहोवा अपने डरवैयों ही से प्रसन्न होता है, अर्थात उन से जो उसकी करूणा की आशा लगाए रहते हैं॥“9
अपने प्रेम और वचनबद्धता को दिखाने का यह ईश्वर का सबसे बड़ा प्रदर्शन है यीशु ने कहा, “इस से बड़ा प्रेम किसी का नहीं, कि कोई अपने मित्रों के लिये अपना प्राण दे।“10यीशु ने हमारे लिए यही किया। अतः “जिस ने अपने निज पुत्र को भी न रख छोड़ा, परन्तु उसे हम सब के लिये दे दिया: वह उसके साथ हमें और सब कुछ क्योंकर न देगा?”11

जो प्रार्थना कबूल नहीं हुई उसका क्या?

लोग बीमार होते हैं, मरते भी हैं, आर्थिक समस्याएँ भी वास्तविक होती हैं। हर तरह की बहुत कठिन परिस्थितियाँ आ सकती हैं। तब क्या?
ईश्वर कहते हैं कि हम अपनी चिन्ता उन्हें दे दें,भले ही परिस्थिति कितनी भी निराशाजनक हो “और अपनी सारी चिन्ता उसी पर डाल दो, क्योंकि उस को तुम्हारा ध्यान है।“12 परिस्थितियाँ ऐसा लगता है हमारे नियंत्रण के बाहर हैं, पर ऐसा नहीं है। जब पूरा संसार लगता है कि एक दूसरे से अलग हो रहा है, तब भी ईश्वर हम सबों को साथ रख सकता है। ऐसे समय में मनुष्य को यह सोचकर ईश्वर का आभारी होना चाहिए कि वह ईश्वर को जानता है। “तुम्हारी कोमलता सब मनुष्यों पर प्रगट हो: प्रभु निकट है।“ “किसी भी बात की चिन्ता मत करो: परन्तु हर एक बात में तुम्हारे निवेदन, प्रार्थना और बिनती के द्वारा धन्यवाद के साथ परमेश्वर के सम्मुख अपस्थित किए जाएं।“ “तब परमेश्वर की शान्ति, जो समझ से बिलकुल परे है, तुम्हारे हृदय और तुम्हारे विचारों को मसीह यीशु में सुरिक्षत रखेगी॥“13 ईश्वर हमें हल दे सकता है, समस्या का समाधान, कल्पना से परे मार्ग संभव कर सकता है। संभवतः एक इसाई अपने जीवन में इस तरह के उदाहरणों की एक सूची तैयार कर सकता है। पर अगर परिस्थितियाँ नहीं सुधरती हैं, तो ईश्वर हमें उसके बीच में भी शांति दे सकता है। यीशु ने कहा, “मैं तुम्हें शान्ति दिए जाता हूं, अपनी शान्ति तुम्हें देता हूं; जैसे संसार देता है, मैं तुम्हें नहीं देता: तुम्हारा मन न घबराए और न डरे।“14
इस बिन्दु पर (जब परिस्थितियाँ अत्यधिक कठिन हों) परमेश्वर हमें लगातार अपने ऊपर विश्वास करने को कहता है – “विश्वास के साथ आगे बढ़िए, न कि उसे देखकर, जो दिखता है” यही बाइबल कहती है। पर यह अंधविश्वास नहीं है। यह ईश्वर के चरित्र पर आधारित है। एक गाड़ी जो गोल्डेन गेट पुल पर से गुजरती है, वह पूरी तरह से पुल की प्रमाणिकता द्वारा संभाली जाती है। इससे फर्क नहीं पड़ता कि ड्राइवर क्या सोच रहा है, क्या अनुभव कर रहा है या गाड़ी में बैठे किसी य़ात्री से चर्चा कर रहा है। गाड़ी को सफलतापूर्वक दूसरी तरफ ले जाने में पुल की प्रमाणिकता का ही हाथ है, जिसपर ड्राइवर भी विश्वास करता है।
उसी तरह ईश्वर हमें अपनी तरफ से उसकी प्रमाणिकता, उसके चरित्र, उसकी वचनबद्धता, प्रेम, ज्ञान, नीतिपरायणता पर विश्वास करने को कहता है। वह कहता है, “यहोवा ने मुझे दूर से दर्शन देकर कहा है। मैं तुझ से सदा प्रेम रखता आया हूँ; इस कारण मैं ने तुझ पर अपनी करुणा बनाए रखी है।15 “हे लोगो, हर समय उस पर भरोसा रखो; उससे अपने अपने मन की बातें खोलकर कहो; परमेश्वर हमारा शरणस्थान है।“16

सारांश प्रार्थना कैसे की जाए?

ईश्वर ने अपने बच्चों की प्रार्थना को कबूल करने के लिए अपने आप को प्रस्तुत किया ( जिन्होंने उसे अपने जीवन में स्थान दिया और उनका अनुसरण किया ) उसने हमसे अपनी कोई भी तकलीफ, प्रार्थना में उसके समक्ष प्रस्तुत करने को कहा और कहा वह उसपर अपनी इच्छा से कार्य करेगा। जैसे हम मुश्किलों का समाधान करते हैं, हमें अपनी परवाह का भार उसपर डालकर उससे शांति लेनी चाहिए जो परिस्थितियों को चुनौती दे। हमारे विश्वास और आशा की नींव ईश्वर का चरित्र है। जितनी अच्छी तरह से हम उसे जानेंगे उतने ही उचित तरीके से हम उसपर विश्वास कर सकेंगे।
ईश्वर के चरित्र के विषय में ज्यादा जानने के लिए कृपया देखें, “ईश्वर कौन है?” या इस साइट पर दूसरा लेख देखें । हमारी प्रार्थना का कारण ईश्वर का चरित्र है। पहली प्रार्थना जो ईश्वर कबूल करेंगे वह आपकी प्रार्थना है ताकि आपका ईश्वर से रिश्ता बन सके।

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